एक नजरिया…

कहने को हम हमेशा वही करते हैं जो हमे खुश करे पर वास्तव में हम यह बहुत कम बार समझ पाते हैं की हमे ख़ुशी किस चीज़ में मिल रही हैं, और मैं यहाँ “जरुरतो” की बात नहीं कर रही हूँ…

मान लीजिये आप रोज़ कोई खेल में विजय होए तो क्या आप खुश होंगे ?
बिलकुल हाँ !!
पर क्या आप पूर्ण रूप से संतुष्ट हैं ?
नहीं !!
आपको क्या चाहिए ?
शायद और उम्दा प्रतिद्वंदी या अप्रत्यक्ष रूप से एक हार जो आपमें जीतने का जज़्बा और उत्साह वापस ले आए |
कुछ ऐसा जो वो जलन और जोश लोट आए जो कभी खेल सीखते समय आपमें रहा करता था |
कहने को आप मात्र अपने नीरस जीवन में कुछ उत्साह भरना चाह रहे हो या कुछ नया सीखने की चाह प्रकट कर रहे हो परन्तु वास्तव में आपको उस परम सुख की चाह हैं जो केवल संतुष्ट हो कर प्राप्त हो सकता हैं |
और वह तृप्ति निरंतर जीत में कतई हासिल नहीं की जा सकती | वो आनंद पूर्णता में नहीं उसके प्रयत्नो में ही प्राप्त हो सकता हैं |

जीवन वह यात्रा हैं जिसका सुख या तो मंज़िल पर पहुँचते ही क्षण-मात्र में भोगा लिया जाए या उस तक पहुचने तक, ना की उसके बाद | इसलिए हमारे लिए आवश्यक हो जाता हैं की हमारे कर्म हमे ऐसी राह की और ले जाए जहाँ चुनौतियां हो, हार हो, त्रुटिया हो, अपूर्णता हो जिनसे हमे ख़ुशी एवं कुछ सीखने को मिले |

क्योंकि १००० हार के बाद जो एक जीत का मज़ा हैं वो १००० निरंतर जीत में नहीं…

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